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Alvida Jumma 2026: रमजान का आखिरी अशरा और अलविदा जुमा की अहमियत, बरकतों वाली यह खास घड़ी

 अलविदा जुमा: रमजान के रुखसत होने का मंजर और इबादत का जज्बा

"दिल्ली की जामा मस्जिद में अलविदा जुमे की नमाज अदा करते हजारों नमाजी, सूर्यास्त का खूबसूरत नजारा और हिंदी में लिखा शीर्षक - अलविदा जुमा: आखिरी मौका।"


रमजान-उल-मुबारक का पवित्र महीना अब अपने अंतिम पड़ाव पर है। आज पूरे देश में 'अलविदा जुमा' यानी रमजान के आखिरी जुमे की नमाज पूरी अकीदत और एहतराम के साथ अदा की जा रही है। मस्जिदों में उमड़ती भीड़, खुदा की बारगाह में झुके हुए सिर और सिसकियों के साथ मांगी जा रही दुआएं—यह नजारा तस्दीक करता है कि बरकतों का यह महीना विदा हो रहा है।

आखिरी अशरे में बढ़ी रूहानियत

रमजान का महीना तीन हिस्सों (अशरों) में बंटा होता है। तीसरा और आखिरी अशरा 'जहन्नम से आजादी' का माना जाता है। इसी दौरान इबादत का जोश अपने चरम पर पहुंच जाता है। रातों को जागकर 'शब-ए-कद्र' की तलाश, तहज्जुद की नमाज और कुरान-ए-पाक की तिलावत में लोग खुद को डुबो देते हैं।

मस्जिदों में एतकाफ (तन्हाई में इबादत) पर बैठने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ गई है। वे दुनियावी मोह-माया से कटकर सिर्फ अपने खालिक (ईश्वर) की याद में मशगूल हैं। यह वह वक्त है जब हर कोई चाहता है कि जाने वाले महीने की हर एक घड़ी का फायदा उठा लिया जाए।

अलविदा जुमा का महत्व

इस्लाम में जुमे के दिन को वैसे ही 'सय्यदुल अय्याम' (दिनों का सरदार) कहा गया है, लेकिन रमजान का आखिरी जुमा एक खास जज्बाती अहमियत रखता है।

1. शुक्रगुजारी: यह दिन इस बात का शुक्रिया अदा करने का है कि अल्लाह ने हमें रमजान जैसा रहमतों वाला महीना नसीब किया।

2. तौबा और माफी: नमाजी इस उम्मीद के साथ सजदे करते हैं कि पूरे महीने की इबादतों में जो कमियां रह गई हों, उन्हें दरगुजर कर खुदा उनकी मगफिरत (माफी) फरमा दे।

3. सामूहिक दुआ: आज के दिन मस्जिदों में मुल्क की सलामती, अमन-चैन और भाईचारे के लिए विशेष दुआएं मांगी जाती हैं।

बाजारों की रौनक और ईद की दस्तक

एक तरफ जहां मस्जिदों में रूहानी सन्नाटा और सुकून है, वहीं दूसरी तरफ बाजारों में ईद की आहट सुनाई देने लगी है। अलविदा जुमे के साथ ही लोग ईद की तैयारियों को अंतिम रूप देने में जुट जाते हैं। नए कपड़े, इत्र, टोपियां और सेवइयों की दुकानों पर भारी भीड़ देखी जा सकती है।

अमीर-गरीब का भेद मिटाकर हर कोई एक-दूसरे की खुशियों में शरीक होने की तैयारी कर रहा है। 'फितरा' (दान) देने का सिलसिला भी तेज हो गया है, ताकि समाज का हर तबका ईद की खुशियों का हिस्सा बन सके।

एक भावुक विदाई

रमजान के जाने का अहसास हर रोजेदार के लिए थोड़ा गमगीन होता है। यह महीना अनुशासन, सब्र और दूसरों के दुख-दर्द को समझने की ट्रेनिंग देता है। अलविदा जुमा उसी ट्रेनिंग के पूरा होने का प्रमाण है। मस्जिदों के मिम्बर से जब इमाम साहब 'अलविदा, अलविदा, ऐ माहे रमजान' पढ़ते हैं, तो कई आंखें नम हो जाती हैं।

निष्कर्ष

अलविदा जुमा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि इंसान के अंदरूनी सुधार का एक पड़ाव है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भले ही रमजान विदा हो रहा है, लेकिन इस महीने में सीखी गई नेकी, सादगी और इबादत की आदत को हमें साल भर बरकरार रखना चाहिए।

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